अभाविप ने जेएनयू में बस्तर की जमीनी सच्चाइयों पर संवाद का किया आयोजन

लाल आतंक की सच्चाई विद्यार्थियों तक पहुंचाना हमारा लक्ष्य: अभाविप अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, जेएनयू इकाई द्वारा आज जेएनयू परिसर में एक संवाद का आयोजन किया गया। जिसका उद्देश्य जेएनयू के विद्यार्थियों के बीच तथ्यों और वास्तविक अनुभवों पर आधारित संवाद पहुंचाना था। कार्यक्रम में बस्तर की जमीनी परिस्थितियों पर लंबे समय से कार्य कर रहे पत्रकार एवं वक्ता श्री विकास रानू तिवारी ने छात्रों को संबोधित करते हुए नक्सलवाद, आदिवासी समाज और बस्तर के बदलते सामाजिक परिदृश्य पर विस्तार से अपने अनुभव साझा किए। बड़ी संख्या में उपस्थित छात्रों ने पूरे कार्यक्रम में गंभीरता से सहभागिता की तथा प्रश्नोत्तर सत्र में भी सक्रिय भागीदारी निभाई। अपने संबोधन में विकास रानू तिवारी ने कहा कि आदिवासियों के बीच माओवादी उनके हितैषी बनकर आए और उस हितैषीपन से अपना कैडर तैयार किया औऱ तमाम जो युवा पीढ़ी थी उसे कैडर बनाकर के अपने लिए एक संगठन का ढांचा बनाया और वे आधिकारिक तौर पर अपनी अलग जनताना सरकार को सब कुछ मानकर चला रहें थें, जिसके इतर एक लोकतांत्रिक सरकार भी थी लेकिन नक्सली उसे आदिवासियों तक पहुचने नहीं देते थे और ऐसे में सशस्त्र बलों के मुठभेड़ का शिकार होते थे। अभाविप जेएनयू अध्यक्ष मयंक पांचाल ने कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण रूप से विश्वविद्यालयों में लंबे समय तक नक्सलवाद को एक रोमांटिक वैचारिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया, जबकि जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल भिन्न है। अभाविप जेएनयू मंत्री प्रवीण के. पीयूष ने कहा कि यह संवाद उन आदिवासी परिवारों की पीड़ा और संघर्ष को समझने का प्रयास था, जिन्हें दशकों तक हिंसा और भय के वातावरण में जीवन बिताना पड़ा।
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